Friday, June 6, 2014

आज फिर पलकें भिगोये ।

एक अरसे बाद आज हम,
फिर तेरी याद में रोए ।
कच्चे सपनों का गुच्छा,
टूटे वायदों की पोटली,
और समेटा खुद के टूटे टुकड़ों को,
जो थे बरसों से खोये ।
एक अरसे बाद आज हम,
फिर तेरी याद में रोए ।

पुरानी तुम्हारी तस्वीर पर जमे,
वक़्त के धूल को आंसुओं से धोए ।
अनकही कहानियाँ, दबे सारे अलफ़ाज़,
वक़्त ने जिनका दम घोटा था,
अँधेरे में उन्हें बोल कर,
आज रात हम चैन से सोये।
एक अरसे बाद आज हम,
फिर तेरी याद में रोए ।

वो पुरानी झील जिसके किनारे,
ख्वाबों के कई सिक्के थे बोए ।
दुनिया की खीस सहकर भी,
उगने को हो आये थे कई,
बेपरवाही से हमने तुमने,
खुद ही उनके अंकुर खोये । 
एक अरसे बाद आज हम,
फिर तेरी याद में रोए।
 

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